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क्या आप असफलताओ से या मेहनत करते हुए भी सफलता नहीं मिलती? तो पढ़े श्री कृष्ण का श्लोक जिसमे उन्होने इसके बारे में क्या बताया हैं
क्या आप असफलताओ से  या मेहनत करते हुए भी सफलता नहीं मिलती? तो पढ़े  श्री कृष्ण का श्लोक जिसमे उन्होने इसके बारे में  क्या बताया हैं

यह भगवद् गीता का एक अत्यंत लोकप्रिय श्लोक है, भारत में अधिकांश बड़े बुजुर्ग , युवा , स्कूली छात्र भी इस श्लोक से परिचित हैं. सिर्फ यह भारत में ही नहीं विदेशो में भी इस श्लोक से परिचित हैं। जब कभी भी हम अपने कर्म , मेहनत की चर्चा करते हैं तो यह श्लोक की हम व्ख्या करते है।यह श्लोक गीता के अध्याय 2 श्लोक 47 लिया गया हैं
गीता के अध्याय 2 श्लोक 47 में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा हैं ,  हे पार्थ मनुष्य को सिर्फ उसके कर्म करने का ही अधिकार है , उसके फलो में कभी नहीं | इसलिये तू कर्मो के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो। इसलिये मनुष्य को कर्म के फलो के बारे में न सोच कर कर्म पर ध्यान देना चाहिए यही उसका अधिकार है न की उसका फल। हे पार्थ मनुष्य को अपने कर्तव्य के अलावे और कुछ भी नहीं सोचना चाहिए, क्यु की कर्तव्य को छोड़ कर उसके बस में कुछ भी नहीं है इसलिए उसे अपने कर्तव्य पर ही ध्यान देना चाहिये , और न ही उसे अपने कर्तव्य करने का अभिमाना होना चाहिये और न ही उसके फल के बारे में चाहिये।
मतलब मनुष्य अपने जीवन में सिर्फ कर्म करने के लिए ही पैदा हुआ हैं न की उसके फल के लिए तथा फल के साथ-साथ मनुष्य को अपने कर्म करने के अभिमान को भी छोड़ना होता हैं। इस धरातल पर मनुष्य विभिन तरह का कर्म करता हैं जैसे की कोई व्यपार करने का कर्म करता हैं ,तो कोई शिक्षा देने का कर्म करता हैं , तो कोई शिक्षा लेने का कर्म करता है , तो कोई क्रीड़ा खेलने का कार्य करता है ,तो कोई घर बनाने का कर्म करता हैं , तो कोई देश की सुरक्षा का कर्म करता हैं। मतलब की इस धरातल पर हर तरह के काम हैं और कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता, मनुष्य कोई भी कार्य करे उसे बस अपने उस कर्तव्य को बिना उसके फल , भोग की चिंता किये बिना करना चाहिये। उदाहरण के तौर पर क्रिकेट के खेल में जब हमे गेंदों से अधिक रन बनाने होते हैं तो बल्लेबाजो पर अधिक दबाव होता हैं। अगर बल्लेबाज अपने स्वभाभिक खेल को बिना उसके परिणाम का खेलता हैं तो वो अपने टीम को जीत दिलाता हैं जीतने के बाद भी वह अपने अच्छे बल्लेबाज होने के अभिमान नहीं करता क्युकी जीत सभी साथी खिलाड़ियों के योगदान से मिला होता हैं , लेकिन वही बल्लेबाज अपने खेल को उसके परिणाम को सोच कर खेलता हैं और वह अपने स्वभाभिक खेल को नहीं खेल पता हैं जिससे वह अपने कर्तव्य से भी बिमुख हो जाता हैं और अपने टीम को जीत नहीं दिला पता हैं. इसी तरह मनुष्य को भी अपने जीवन में सिर्फ अपने कर्तव्य को बिना फल के बारे में सोचे बिना कर्तव्य करते रहना चाहिये क्युकी परिणाम (फल ) पर हमारा अधिकार नहीं हैं।नहीं उसके भोग पे।
हमारे कर्तव्य के फल तथा उसके भोग देने का अधिकार सिर्फ उस परमेश्वर के पास हैं। परमेश्वर ने जो हमे दिया हैं हमे निष्ठा पूर्वक उस कर्तव्य में लीन रहना चाहिय।
श्रीकृष्ण चाहते हैं कि अर्जुन कर्त्ताभिमान, या कर्ता होने का अहंकार छोड़ दे। वह अर्जुन को निर्देश देता है कि वह अपने कार्यों से जुड़े पूर्व निर्धारित उद्देश्यों के बाद कभी पीछा न करे और न ही खुद को अपने कार्यों के परिणामों का कारण समझे। हालाँकि, जब हम कार्रवाई करते हैं, तो हमें खुद को उन कार्यों के कर्ता-धर्ता क्यों नहीं समझना चाहिए? कारण यह है कि हमारी इंद्रियां, मन और बुद्धि जड़ हैं; ईश्वर उन्हें अपनी शक्ति से ऊर्जान्वित करता है और उन्हें हमारे निपटान में डालता है। परिणामस्वरूप, केवल उस शक्ति की सहायता से जो हम उससे प्राप्त करते हैं, क्या हम कार्य करने में सक्षम हैं। उदाहरण के लिए, रसोई में चिमटे स्वयं से निष्क्रिय होते हैं, लेकिन वे किसी के हाथ से सक्रिय हो जाते हैं, और फिर वे कठिन काम भी करते हैं, जैसे कि जलते हुए कोयले को उठाना, आदि। अब अगर हम कहें कि चिमटे क्रियाओं के कर्ता हैं। यह गलत होगा। यदि हाथ ने उन्हें सक्रिय नहीं किया, तो वे क्या कर पाएंगे? वे मेज पर केवल जड़ता में लेट गए। इसी प्रकार, यदि भगवान हमारे शरीर-मन-तंत्र को क्रिया करने की शक्ति प्रदान नहीं करते, तो हम कुछ भी नहीं कर सकते थे। इस प्रकार, हमें यह करने का अहंकार छोड़ देना चाहिए, यह याद रखना कि ईश्वर शक्ति का एकमात्र स्रोत है जिसके द्वारा हम अपने सभी कार्यों को करते हैं।

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